Home राज्य की खबरें बिहार चुनाव: गौरा-बौराम पर सुलह, लेकिन बाकी सीटों पर महागठबंधन में मचा...

बिहार चुनाव: गौरा-बौराम पर सुलह, लेकिन बाकी सीटों पर महागठबंधन में मचा घमासान

बिहार चुनाव
बिहार चुनाव

बिहार चुनाव का माहौल गर्म है और इस बार सियासी समीकरण लगातार बदल रहे हैं। “बिहार चुनाव: गौरा-बौराम पर सुलह, लेकिन बाकी सीटों पर महागठबंधन में मचा घमासान” यही स्थिति इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में है। एक ओर महागठबंधन ने कुछ सीटों पर तालमेल दिखाया है, तो दूसरी ओर कई क्षेत्रों में सहयोगी दल आमने-सामने हैं। इससे न सिर्फ सीट शेयरिंग की राजनीति पेचदार हुई है बल्कि कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस की स्थिति भी बनी हुई है।

बिहार में सीट बंटवारे को लेकर मचा घमासान

महागठबंधन के भीतर सीटों को लेकर खींचतान लंबे समय से जारी थी। गौरा-बौराम सीट पर आखिरकार सुलह हो गई है, जहां आरजेडी और कांग्रेस ने मिलकर फॉर्मूला तैयार किया। लेकिन बाकी सीटों पर हालात इतने सहज नहीं हैं। पहले चरण की पांच सीटों पर “फ्रेंडली फाइट” की नौबत आ गई है, यानी सहयोगी दल एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में उतरने वाले हैं।

गौरा-बौराम पर समझौता, बाकी सीटों पर संकट

सूत्रों के मुताबिक, गौरा-बौराम सीट पर आरजेडी ने कदम पीछे खींचते हुए कांग्रेस उम्मीदवार को मौका देने पर सहमति जताई। इस कदम को गठबंधन के भीतर सामंजस्य का संकेत माना जा रहा है। लेकिन बाकी सीटों पर स्थिति उलट है — खासकर दरभंगा, सहरसा, नवादा, और औरंगाबाद में दोनों दलों के उम्मीदवार तैयार बैठे हैं।

सीट का नाम              पार्टी A की स्थिति             पार्टी B की स्थिति             स्थिति

गौरा-बौराम                   समझौता हुआ               सहयोगी समर्थन               सुलह

दरभंगा                         उम्मीदवार तय              उम्मीदवार तय            फ्रेंडली फाइट

सहरसा                         टिकट विवाद                 टिकट विवाद              अनिर्णय

नवादा                         सीट डिमांड जारी               प्रत्याशी तैयार            घमासान

औरंगाबाद                आरजेडी उम्मीदवार फाइनल       कांग्रेस आपत्ति           टकराव

सीट बंटवारे को लेकर अंदरूनी मतभेद

गठबंधन में यह खींचतान सिर्फ सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई जगहों पर स्थानीय नेताओं की असहमति भी सामने आई है। कुछ सीटों पर कार्यकर्ता यह मान रहे हैं कि पार्टी नेतृत्व ने उनकी राय के बिना फैसला लिया है। ऐसे में ग्राउंड लेवल पर असंतोष की स्थिति बन रही है।

महागठबंधन के लिए चुनौती क्यों बढ़ी

पहले चरण की 5 सीटों पर “फ्रेंडली फाइट” का मतलब है कि महागठबंधन के वोटर दो हिस्सों में बंट सकते हैं। इसका सीधा फायदा एनडीए को मिलने की संभावना जताई जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर यह मतभेद जल्द नहीं सुलझाए गए, तो पहले चरण के चुनाव में महागठबंधन को नुकसान झेलना पड़ सकता है।

विशेषज्ञों की राय

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि

गठबंधन की एकजुटता दिखाना इस समय सबसे जरूरी है।

लोकल स्तर पर नाराज नेताओं को मनाना ही रणनीति की सफलता तय करेगा।

अगर तालमेल नहीं बैठा तो ‘फ्रेंडली फाइट’ एनडीए के लिए बड़ा तोहफा साबित हो सकती है।

पहले चरण की 5 सीटों पर ‘फ्रेंडली फाइट’ का असर

राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो पहले चरण की 5 सीटों पर फ्रेंडली फाइट का असर सीधा चुनावी नतीजों पर पड़ेगा। इन सीटों पर दोनों दलों का वोट बैंक लगभग समान है, और इस वजह से बंटवारा तय माना जा रहा है।

   चरण             प्रभावित सीटें           संभावित असर                लाभ किसे

पहला चरण           5 सीटें              वोट बंटवारा                 एनडीए को लाभ

दूसरा चरण           3 सीटें           रणनीतिक बदलाव संभव           तय नहीं

तीसरा चरण          2 सीटें            समझौते की कोशिश          गठबंधन के लिए राहत

गठबंधन की रणनीति क्या होगी आगे

महागठबंधन अब क्षति नियंत्रण में जुट गया है। सूत्रों का कहना है कि आने वाले कुछ दिनों में सीटों को लेकर पुनर्विचार हो सकता है। पार्टी नेतृत्व ने स्थानीय इकाइयों से रिपोर्ट मांगी है कि कहां पर कौन-सा उम्मीदवार ज्यादा मजबूत है। इसके बाद कुछ सीटों पर प्रत्याशी बदलने या समर्थन वापस लेने पर भी विचार किया जा सकता है।

जनता की प्रतिक्रिया

सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा खूब चर्चा में है। कार्यकर्ता खुलकर अपनी नाराजगी जता रहे हैं, जबकि कुछ समर्थक इसे “सियासी रणनीति” बता रहे हैं। जनता का मानना है कि अगर गठबंधन अंदरूनी मतभेद छोड़कर एकजुट नहीं हुआ तो विपक्ष को इसका पूरा फायदा मिलेगा।

राजनीतिक समीकरण कैसे बदल सकते हैं

अगर महागठबंधन तालमेल बना लेता है, तो एनडीए के लिए मुकाबला मुश्किल हो सकता है।

फ्रेंडली फाइट जारी रही, तो वोट बंटवारा तय है।

छोटे दलों की भूमिका निर्णायक बन सकती है, खासकर सीमांचल और कोसी क्षेत्र में।

निष्कर्ष

“बिहार चुनाव: गौरा-बौराम पर सुलह, लेकिन बाकी सीटों पर महागठबंधन में मचा घमासान” इस बात को साफ दर्शाता है कि बिहार की राजनीति अभी भी सीट बंटवारे और आपसी मतभेदों के चक्रव्यूह में फंसी है। गठबंधन अगर एकजुट नहीं हुआ तो इसका सीधा असर नतीजों पर पड़ेगा। आने वाले कुछ दिनों में इस घमासान का अंजाम क्या होगा, यह देखने लायक होगा।

Young Time News

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

प्रश्न 1: क्या गौरा-बौराम सीट पर महागठबंधन में सुलह हो गई है?

हाँ, इस सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने पर सहमति बन गई है।

प्रश्न 2: बाकी सीटों पर क्या स्थिति है?

दरभंगा, सहरसा, नवादा और औरंगाबाद जैसी सीटों पर अभी भी टकराव जारी है।

प्रश्न 3: फ्रेंडली फाइट का क्या मतलब है?

जब गठबंधन के दो दल एक ही सीट पर अलग-अलग उम्मीदवार खड़े करते हैं, तो उसे फ्रेंडली फाइट कहा जाता है।

प्रश्न 4: इसका असर चुनावी नतीजों पर कितना होगा?

इससे वोट बंटवारा होता है और विरोधी गठबंधन को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिलता है।

प्रश्न 5: क्या आने वाले दिनों में मतभेद सुलझ सकते हैं?

संभावना है, क्योंकि दोनों दलों के शीर्ष नेता बातचीत के ज़रिए समाधान निकालने की कोशिश कर रहे हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here